उस रात बुआ ने जो कहा – 1
- June 7, 2026
- 2
जुलाई का महीना था। शाम से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। हवा इतनी तेज चल रही थी कि घर की खिड़कियाँ बार-बार हिल रही थीं।
जुलाई का महीना था। शाम से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। हवा इतनी तेज चल रही थी कि घर की खिड़कियाँ बार-बार हिल रही थीं।
जुलाई का महीना था। शाम से ही आसमान में काले बादल छाए हुए थे। हवा इतनी तेज चल रही थी कि घर की खिड़कियाँ बार-बार हिल रही थीं। मैं अपने कमरे में लेटा मोबाइल चला रहा था। कॉलेज की छुट्टियाँ थीं, इसलिए पूरा दिन वैसे भी बोरियत में निकल रहा था।
मम्मी-पापा किसी रिश्तेदार की शादी में शहर से बाहर गए हुए थे और घर में सिर्फ मैं अकेला था।
तभी अचानक फोन बजा।
स्क्रीन पर मम्मी का नाम दिख रहा था।
“हाँ मम्मी?”
“सुनो, तुम्हारी बुआ आज रात वहीं रुकेंगी।”
मैं थोड़ा चौंका।
“अचानक?”
“हाँ, उनकी बस बारिश की वजह से कैंसल हो गई। वो आधे घंटे में पहुँच जाएँगी।”
“ठीक है।”
फोन कट गया।
मैं नीचे हॉल में आया और जल्दी-जल्दी घर थोड़ा ठीक करने लगा। बाहर बारिश अब और तेज हो चुकी थी। आसमान में लगातार बिजली चमक रही थी।
करीब 20 मिनट बाद बाहर कार रुकने की आवाज़ आई।
मैंने दरवाज़ा खोला।
सामने बुआ खड़ी थीं।
हल्का नीला सूट, खुले बाल और चेहरे पर हल्की मुस्कान। बारिश की बूंदें उनके चेहरे और दुपट्टे पर चमक रही थीं।
“क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहे हो?” बुआ हँसते हुए बोलीं।
मैं थोड़ा संभलते हुए बोला,
“कुछ नहीं… अंदर आइए।”
बुआ अंदर आईं और अपना बैग सोफे के पास रख दिया।
“घर में और कोई नहीं है?” उन्होंने पूछा।
“नहीं, मम्मी-पापा कल सुबह आएँगे।”
“मतलब पूरी रात सिर्फ हम दोनों?”
मैं हल्का सा मुस्कुरा दिया।
“हाँ।”
बुआ ने भी मुस्कुराकर मेरी तरफ देखा। पता नहीं क्यों उस समय उनकी आँखों में कुछ अलग सा लगा।
मैंने जल्दी से किचन में जाकर उनके लिए चाय बनाई। जब वापस आया तो वो टीवी ऑन करके बैठी थीं।
“लो बुआ, चाय।”
उन्होंने कप लिया और एक घूंट पीते ही बोलीं,
“वाह… अब तो तुम बड़े हो गए हो। अच्छी चाय बनाना सीख गए।”
“मजबूरी में सीखना पड़ा।”
“अच्छा है… शादी के बाद काम आएगा।”
मैं हँस पड़ा।
“अभी तो शादी का कोई प्लान नहीं है।”
“आज नहीं तो कल करना ही पड़ेगा।”
हम दोनों हल्का सा हँस दिए।
बाहर बारिश लगातार बढ़ती जा रही थी। पूरा माहौल किसी फिल्म जैसा लग रहा था।
तभी अचानक जोर से बिजली चमकी… और अगले ही पल लाइट चली गई।
पूरा घर अंधेरे में डूब गया।
“ओह नो…” बुआ धीरे से बोलीं।
“डर लग रहा है क्या?”
“मुझे बारिश में अंधेरे से हमेशा डर लगता है।”
मैंने स्टोर से मोमबत्ती निकाली और जला दी। उसकी हल्की पीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
उस रोशनी में बुआ का चेहरा और भी खूबसूरत लग रहा था।
कुछ पल तक हम दोनों चुपचाप बैठे रहे। सिर्फ बारिश की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
फिर अचानक बुआ बोलीं,
“तुम काफी बदल गए हो।”
“कैसे?”
“पहले बहुत बच्चे थे… अब समझदार लगते हो।”
“सच में?”
“हाँ… और थोड़े हैंडसम भी।”
मैं मुस्कुरा दिया।
“आप भी ना।”
बुआ भी हल्का सा हँस दीं।
रात धीरे-धीरे और गहरी होने लगी थी। बाहर तूफान जैसा माहौल था।
मैंने किचन में जाकर खाना बनाया। साधारण दाल, चावल और पनीर की सब्ज़ी।
जब हम दोनों साथ बैठकर खाना खाने लगे तो बुआ ने कहा,
“वैसे खाना अच्छा बनाते हो।”
“इतना भी अच्छा नहीं।”
“झूठ मत बोलो, काफी अच्छा है।”
मैं मुस्कुरा दिया।
खाना खाते-खाते बुआ अचानक बोलीं,
“कॉलेज में कोई लड़की पसंद है?”
मैं थोड़ा चौंका।
“नहीं।”
“इतने सीधे मत बनो।”
“सच बोल रहा हूँ।”
“मुझे नहीं लगता।”
हम दोनों हँस पड़े।
“वैसे आपको कैसे पता कि कॉलेज वाले लड़के कैसे होते हैं?” मैंने पूछा।
“क्योंकि मैं भी कभी कॉलेज में थी।”
“उस टाइम आपके पीछे कितने लड़के थे?”
बुआ जोर से हँस पड़ीं।
“बहुत शरारती हो गए हो।”
“सवाल का जवाब नहीं दिया आपने।”
“कुछ बातें ना जानना ही अच्छा होता है।”
मैंने मजाक में कहा,
“मतलब बहुत थे।”
“चुप करो।”
दोनों फिर हँस पड़े।
खाना खत्म होने के बाद हम हॉल में आकर बैठ गए। बाहर लगातार बारिश हो रही थी। हवा इतनी तेज थी कि खिड़कियाँ हिल रही थीं।
तभी अचानक बहुत तेज आवाज़ के साथ बादल गरजे।
बुआ डरकर मेरे बिल्कुल पास आ गईं।
“इतना डर लगता है आपको?”
“बहुत।”
मैं हल्का सा हँस पड़ा।
“हँसो मत।”
“अच्छा ठीक।”
उस समय हम दोनों काफी पास बैठे थे।
कुछ सेकंड तक कोई कुछ नहीं बोला।
कमरे में सिर्फ बारिश की आवाज़ गूंज रही थी।
फिर बुआ धीरे से बोलीं,
“तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ?”
मैं थोड़ा चौंका।
“नहीं।”
“सच?”
“हाँ।”
“अजीब हो।”
“क्यों?”
“आजकल सबको हो जाता है।”
मैंने मुस्कुराकर कहा,
“शायद मेरा टाइम नहीं आया।”
बुआ कुछ पल चुप रहीं। फिर धीरे से बोलीं,
“कभी-कभी कुछ लोग देर से जिंदगी में आते हैं…”
मैं उनकी तरफ देखने लगा।
उनकी आँखों में उस समय अजीब सी गहराई थी।
लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि वो सिर्फ सामान्य बात कर रही थीं या कुछ और कहना चाहती थीं।
रात के करीब 12 बज चुके थे।
“चलो अब सो जाते हैं,” मैंने कहा।
“हाँ।”
मैंने बुआ को गेस्ट रूम दे दिया और खुद हॉल में गद्दा लगाने लगा।
लेकिन पता नहीं क्यों मुझे नींद नहीं आ रही थी।
बारिश की आवाज़, रात की खामोशी और बुआ की बातें बार-बार दिमाग में घूम रही थीं।
करीब आधे घंटे बाद कमरे का दरवाज़ा खुला।
मैं उठकर बैठ गया।
“क्या हुआ बुआ?”
“नींद नहीं आ रही।”
“क्यों?”
“बारिश और बिजली की वजह से।”
वो धीरे से आकर मेरे पास बैठ गईं।
“तुम्हें सच में डर नहीं लगता?”
“नहीं।”
“Lucky हो।”
हम दोनों चुपचाप बाहर बारिश देखते रहे।
तभी अचानक तेज बिजली चमकी और बुआ डरकर मेरा हाथ पकड़ लिया।
मेरी सांसें जैसे कुछ पल के लिए रुक गईं।
उन्होंने तुरंत हाथ छोड़ दिया।
“Sorry…”
“It’s okay…”
लेकिन अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा था।
दिल बहुत तेजी से धड़क रहा था।
बुआ धीरे से उठीं और बालकनी के पास जाकर खड़ी हो गईं।
मैं भी उनके पास चला गया।
ठंडी हवा चल रही थी। बारिश की छोटी-छोटी बूंदें अंदर तक आ रही थीं।
“मौसम कितना अजीब होता है ना,” बुआ बोलीं।
“हाँ।”
“कुछ रातें इंसान कभी नहीं भूलता…”
मैं उनकी तरफ देखने लगा।
तभी उन्होंने मेरी तरफ मुड़कर कहा,
“अगर मैं तुमसे एक बात कहूँ… तो तुम गलत तो नहीं समझोगे?”
मेरा दिल अचानक तेजी से धड़कने लगा।
“क्या?”
उन्होंने कुछ सेकंड तक मेरी आँखों में देखा…
और फिर धीरे से बोलीं,
“तुम अब बच्चे नहीं रहे…”
मैं पूरी तरह चुप हो गया।
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या बोलूँ।
बाहर लगातार बारिश हो रही थी…
और उस रात के बाद सब कुछ बदलने वाला था।
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